Thursday, 1 December 2016

ड्रैगन का फैलता दायरा और भारत की तैयारी

चीन के भारत को लेकर मनसूबे अच्छे है या नहीं इस बात को लेकर बहस की गुंजाइश नहीं होना चाहिए। चीन एक विशाल कार्ययोजना पर काम कर रहा है, जिसमें वो एशिया और यूरोप सहित अमेरिका तक अपनी पहुंच और दबदबा कायम करने का प्रयास कर रहा है। इस प्रयास का आगाज चीन की उस साम्राज्यवादी नीति से हुआ है, जिसका विषबीजारोपण माउत्से जेंडांग ने किया था। एक शांत पर खूंखार दुश्मन की तरह चीन ने भारत को हमेशा एक ऐसी मात दी है जिसमें भारत ने पीछे हटना ही ङ्खीक समझा है। प्रधानमंत्री नेहरू के शांति के कबूतरों को चीन ने अपने निशाना लगाने की क्षमता का पता लगाने का एक अच्छा जरिया बनाया और भारत की जमीन पर कब्जा जमा लिया। भारत ने चीन पर दबाव बनाने के लिए उसे यूएन की सदस्यता दिलवाई, जिसमें भी चीन ने भारत को ही दगा ही दी।चीन, एक समय का नशेडिय़ों का ये देश एक अंगड़ाई के साथ कुछ यूं उठेगा और अपनी जहरीली फुफकार से अपने पड़ोसियों की नींद यूं हराम कर देगा ऐसा किसी ने सोचा ही नहीं था। माओ जब चीन की सत्ता पर काबिज हुआ उसने चीन को बंटा हुआ पाया, अपनी कुर्सी बचाने और जनतंत्रवादियों को कुचलने के लिए उसने साम्यवाद का ऐसा ड्रेगन पैदा किया जिसने अपनी कुंडली में भारत से मुक्त तिब्बत और कई छोटे देशों को ले लिया। बारह देशों से टकराती अपनी सीमा पर चीन किसी से भी नहीं लड़ा हो ऐसा इतिहास में तो कहीं दिखाई नहीं देता। चीन, भारत के समान ही एक प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न देश रहा है। साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में चीन में बहुत काम हुआ है और यहां के प्राचीन यात्रियों ने भारत से बहुत सा ज्ञान चीन भी पहुंचाया है। चीन को बौध धर्म की उर्वरित विरासत भी भारत की ही देन है। चीन, भारत के समानांतर ही रहा है, पर एक ही बात में चीन पिछड़ गया वो था समय-समय पर महापुरुषों का आगमन और भारत के सभी क्षेत्रों में उनका योगदान। जिससे भारत में ऐसे महान परिवर्तन आए जिनकी वजह से देश तो देश पूरे विश्व में एक सृजनात्मक लहर चल पड़ी। वेदों का अलौकिक ज्ञान हो या आज-कल चल रही योग की पुरवाई भारत ने विश्व में एक महान देश का दर्जा पाया पर चीन, चीन को मिला नशेडिय़ों के देश का उपनाम, रक्तपिपासु माओ, धोखेबाज और अविश्वसनीय देश का तमगा जिसकी वजह से चीनियों को दूसरे देशों में भी हिकारत की नजर से देखा जाता है। विश्व में भारत के युवाओं को एक सुपर आउटसोर्सिंग और सुपर्ब प्रोडक्टिव जीनियस के रूप में जाना-माना जाता है। वहीं चीन के युवाओं को शंका की दृष्टि से देखा जाता है। भारत से चिढऩे के चीन के पास कई कारण है। चीन, भारत को घेरने के साथ ही पूरे विश्व में अपना दबैल कायम करने के प्रयास में लगा हुआ है। इसी के चलते उनसे बर्बाद मुल्क पाकिस्तान को सहियोग देना शुरू कर दिया है। वहां वो एक बंदरगाह भी बना रहा है जिसका मकसद है हिन्द महासागर में अपना सर्चस्व कायम करना। एक बात यहां बताने लायक है कि चीन ने एक ऐसा बंदरगाह भी बनाया है, जो समुद्र में भीतर बना है। यहां क्या हो रहा है? किसी को मालूम नहीं है, यहां तक कि अमेरिका के शक्तिशाली कैमरों से लैस उपग्रह भी यहां की सच्चाई का पता नहीं लगा सके। अगर ऐसा ही कुछ पाकिस्तान में हुआ तो जाहिरातौर पर ये भारत के लिए तो अनुकूल हो ही नहीं सकता। ब्रम्हपुत्र का बांध तो भविष्य में परेशानी लाएगा ही। इस बांध का मतलब ही है कि चीन पानी को अपने उन क्षेत्रों की ओर में मोड़ देगा जहां प्राय: सूखा ही रहता है वो खाद्यान्न उगाएगा, बेचेगा, लाभ कमाएगा। साथ ही वो भविष्य में वैश्विक स्तर आने वाली पीने के शुद्ध पानी की समस्या से भी लाभ कमाने की सोच रखता है, इसके लिए वो हिमालय के ग्लेशियरों को लेसर से पिघलाने का भयानक काम भी कर सकता है। चीन इस पानी को बेचेगा और अपने उपयोग में भी लेगा। भारत इसके विरोध में क्या कर सकता है? चीन की इसी तकनीक का प्रयोग पाकिस्तान कर चुका है, जिसका भारत ने विरोध भी किया था। चीन के वैज्ञानिक नकली बारिश भी करवाने का प्रयोग करते रहते हैं जिसकी वजह से कई बार बादल फटते है और लोग मर जाते है। भारत में भी वो ऐसा कर चुका है। इसके साथ ही इस शैतानी पड़ोसी ने पाकिस्तान के साथ एक आर्थिक गलियारे पर भी काम शुरू कर दिया है जिसका एक खास मकसद है हिन्द महासागर पर नियंत्रण करना। चीन भारत के मुंबई सहित अन्य खास बंदरगाहों को निशाने पर लेना चाहता है। माल जो आ रहा है और जा रहा है उस पर नजर और मौके पर वार। भारत में चीन का अच्छा-खासा बाजार है। उसने बाजार के नाम पर भारत को किस तरह से जकड़ा है इसका अंदाजा विपत्ति के समय ही होगा। चीन ने भारत में मोबाइल उतारकर भारत की संचार व्यवस्था पूरा जायजा ले ही लिया है। यहां तक बताया जाता है चीन के हैकरों ने भारत ही नहीं अमेरिका तक की सुरक्षा साइटों में सेंध लगाकर महत्वपूर्ण जानकारी निकल ही है। चीन की साइबर फौज कितनी सक्षम है इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि गूगल को चीन से अपना बोरिया-बिस्तर तक बांधना पड़ गया था। यूएन में शिकायत भी की गई पर हुआ कुछ भी नहीं पर चीन ने अपनी ही एक सर्च इंजन खड़ा कर डाला। चीन भारत को बासट की याद दिलाता है पर वो ब्रम्होस और अन्य अणविक हथियारों को भी देखता है। डरता है। उसके सैनिक भारत की सीमा में आते है और दोस्ती के गुलाब जामुन खाकर बिना बिल चुकाए निकल जाते हैं। चीन अपने जहरीले सामान को भी भारत में खपाता रहा है। कभी जब भारत ने विरोध किया तो मामला यूएन तक चीन ने उछाला। चीन के जिस सामान को अमेरिका और यूरोप ने भी प्रतिबंधित रखा है उसे भारत आराम से ले रहा है। ये मामला इतना बड़ा है कि इसपर एक अन्य लेख तक लिखा जा सकता है। खैर, इस लेख का विषय दूसरा है सो विषय पर आते हैं। चीन अब पाकिस्तान को भारत के साथ काउंटर बैलेंस कर रहा है और वहां के आतंकवाद को भारत को रोकने का अच्छा जरिया भी मान रहा है इसके चलते उसने मसूद अजहर के नाम पर यूएन में वीटो भी किया। डोल्कुन ईसा प्रकरण पर भारत को चीन के दबैल में माना गया पर यहां यह बात जानने योग्य है कि पाक-चीन आर्थिक गलियारा चीन के शिंझियांग से होकर गुजरने वाला है, यह स्थान भारत की सीमा से भी टकराता है। यहां के मुसलमान चीन विरोधी हैं (ये बहुसंख्यक हैं और चीन विरोधी संघर्ष में हमेशा से रत रहे हैं।) और उन्हें सम्हाल पाना चीन के लिए मुश्किल जरूर है। हान समुदाय को वहां बसाकर और मदद देकर चीन वहां एक काउंटर बैलेंस पैदा करना चाहता है पर ये इतना आसान नहीं है। पाकिस्तान की नजर शिंझियांग के मुसलमानों पर है और वो भविष्य में इनका उपयोग चीन की नाक में नकेल की तरह करना चाहता है। डोल्कुन का भारत आना शिंझियांग के मुसलमानों को सहियोग देने जैसे ही था, हालांकि चीन का दबाव नजरंदाज नहीं किया जा सकता। अब सवाल है कि भारत अपने इस हजारों मुंह वाले ड्रेगन शत्रु से कैसे निपटे जो कब किस मुंह से जहर उगलेगा कहना मुश्किल है। हमें याद करना होगा आचार्य कौटिल्य को और उनकी नीति को या तो चीन से दोस्ती का प्रयास करें और अगर वो वहां भी अपने इतिहास को दोहराने के मूड में हो तो उसके सभी पड़ोसियों से मिलकर इंटरनेशनल/एशियन एसोसिएशन ऑफ वॉर अगेंस्ट एंटी पीस नेशंस गुट का निर्माण करे जिसके जरिये वो ऐसे देशों पर दबाव बना सके। हालांकि विभिन्न इंसानों को इकट्ठा करना और समझाना कुत्तों की तुलना में थोड़ा तो आसान ही है, है न!